Wednesday, 13 July 2016

शब्द-सृजन

खगोलशास्त्री  कहते हैं कि सृष्टि का निर्माण महाविस्फोट से हुआ और इस महाविस्फोट के साथ ही एक महानाद-महाध्वनि भी पैदा हुई।यह महाध्वनि सृष्टि के हर कण में समाहित है और कोई भी क्रिया बिना ध्वनि के नहीं होती।जहां भी कोई घटना घटती है,वहां कोई न कोई ध्वनि भी पैदा होती है। प्रकृति में जितनी भी गतिविधियां हैं,क्रियाएं हैं, उनकी अपनी एक अलग ध्वनि होती है।जब भी क्रिया संपन्न होती है,यह ध्वनि उत्पन्न होती है।हवा का चलना,नदी का बहना,आग का जलना, पानी का बरसना,बिजली का कड़कना, पक्षियों का चहचहाना,गाय का रंभाना,शेर का दहाड़ना आदि सभी क्रियाओं की अपनी ध्वनि होती है।जब हमारे मनीषियों ने इन्हें सुना,समझा,गुना और उन्हीं ध्वनियों को पुनः व्यक्त करने की आवश्यकता अनुभव की तो उन्हें कठिनाई  हुई। वे इन ध्वनियों को मुंह से निकाल तो लेते थे लेकिन उन्हें दूसरों को बताने में,संजो कर रखने में असुविधा हुई।इसी असुविधा को दूर करने के प्रयास में बोली और भाषा का विकास हुआ।पहले इन ध्वनियों को बोल कर ही व्यक्त किया जाता था,फिर जब इन्हें स्थायी बनाने की आवश्यकता हुई तो लिपि का निर्माण हुआ।हिंदी की जिस लिपि का हम लोग आजकल प्रयोग करते हैं उसे देवनागरी कहते हैं।यह प्रकृति की इन्हीं ध्वनियों को आकार देने से बनी है। आज का स्वरुप प्राप्त करने में इसे लंबी यात्रा करनी पड़ी और अनेक परिवर्तनों से दो -चार होना पड़ा। बोली और भाषा पहले आई, लिपि बाद में।हम जैसी ध्वनि सुनते, वैसी मुंह से निकाल तो लेते थे लेकिन उसे कैसे व्यक्त करें इसके लिए लिपि की आवश्यकता अनुभव की तो प्रकृति की इन ध्वनियों को उसी रूप में व्यक्त करने का प्रयास किया गया और हिंदी भाषा की इकाई वर्ण- स्वर और व्यंजन का अविष्कार हुआ।स्वर का अर्थ ही ध्वनि होता है।हमारे मनीषियों ने इन ध्वनियों में छिपे संदेश को सुना और उनको व्यक्त करने के लिए वर्णों का आकार निश्चित किया।चूंकि कोई भी ध्वनि अकेले किसी एक स्वर या व्यंजन से नहीं बनती, उसमें कई तरह का आरोह-अवरोह होता है,इसलिए स्वरों और व्यंजनों का स्वरुप तय किया गया।ये ध्वनियों को पूर्ण स्वरुप प्रदान करते हैं।जब हम सर -सर बहती हवा कहते हैं या कल- कल बहती नदी कहते हैं तो इसमें हवा और पानी के चलने और बहने की ध्वनि का आभास होता है।इसे ही स्थायी रूप से व्यक्त करने के लिये स्वर,व्यंजन,अक्षर,शब्द,वाक्य और अंत में भाषा बनी।
स्वर और व्यंजन ही मिलकर अक्षर बनते हैं।अ मूल स्वर है जो सभी व्यंजनों में निहित होता है।बिना अ के योग से कोई अक्षर नहीं बन सकता।किसी भी अक्षर में अ एक खड़ी रेखा ( पाई ) के रूप में शामिल होता है,कभी आधे रूप में कभी पूरे रूप में। कई अक्षर मिलकर शब्द और कई शब्द मिलकर वाक्य बनाते हैं।शब्दों का वह समूह जिनका निश्चित अर्थ निकलता है वाक्य कहलाता है।

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