Monday, 1 August 2016

विनोद भैय्या काबहुआयामीय व्यक्तित्व


हिन्दी पत्रकारिता में समाचार प्रबंधन के पितामह श्री विनोद शुक्ल बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं, वह एक कुशल संगठनकर्ता, योजना निर्माता, संचालनकर्ता के साथ ही गहरी दूरदृष्टि वाले व्यक्ति हैं। उत्तर प्रदेश में हिन्दी समाचार पत्रों को बहुसंस्करणीय रूप देने में उनका योगदान नींव के पत्थर की तरह है। वह एक सम्पूर्ण, आकर्षक और समाज को दिशा देने वाले समाचार पत्र के प्रकाशन का लक्ष्य लेकर निकले थे और यह लक्ष्य उन्होंने पाया भी। नयी पीढ़ी को वह यही उपदेश भी देते हैं- अपने भीतर के पत्रकार को कभी मरने मत देना। वह अपने साथियों और सहकर्मियों के संरक्षक भी हैं- इसी गुण के कारण लोग उन्हें भैय्या का स्नेह आदर भरा संबोधन देते हैं और वे भी हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहते हैं, गलती पर डांटने से नहीं चूकते तो अच्छा काम करने का पुरस्कार भी मिलता है।
मैने सबसे पहले उन्हें कानपुर में आज का प्रकाशन शुरू होने के समय देखा। 15 अप्रैल 1975 का दिन था। मैं वाराणसी के जनवार्ता में दो-ढ़ाई साल काम कर चुका था। आज में काम करने का मन था। श्री विद्याभास्कर जी, श्री चंद्रकुमार जी से मिलने के बाद मुझसे कहा गया कि कानपुर जाकर श्री विनोद शुक्ल से मिलें। मैं कानपुर पहुंचा। डिप्टी पड़ाव स्थित आज दफ्तर में पहुंचा। कुछ लोग पूर्व परिचित थे जैसे श्री पारस नाथ सिंह जी, (पारस बाबू की प्रेरणा और सहयोग से ही मैं आज में आ सका था) श्री मंगल जायसवाल, राममोहन पाठक आदि। मैं पारस बाबू से मिला, उन्होंने कहा विनोद जी मशीन की तरफ हैं मिले लो। मैं मशीन की तरफ गया, वहां महाप्रबंधक की तरह कोई व्यक्ति नहीं दिखायी दिया, कई लोग मशीन साफ करने में लगे थे, चार दिन बाद आज का प्रकाशन शुरू होना था। मैने संकोच के साथ एक व्यक्ति से पूछा- श्री विनोद शुक्ल जी कहां हैं- उसने मशीन साफ करने में लगे एक सुदर्शन व्यक्ति की तरफ इशारा किया। विनोद भैय्या सफेद हाफ पैंट और सैण्डो बनियाइन पहने मशीन साफ करने में लगे थे। हाथ में मिट्टी के तेल में भीगा टाट का टुकड़ा था, दोनों हाथ कालिख से काले थे। यह भैय्या के प्रयास का ही परिणाम था कि आज अखबार पुरानी जंग लग चुकी मशीन पर बिना एक दिन डमी निकले 19-20 अप्रैल 75 को प्रकाशित हुआ और पहले दिन से ही उसने अपनी उपस्थिति कानपुर में दर्ज करा दी। लेकिन भैय्या के श्रम और सपने को आज के स्वामी  नहीं समझ सके, दोनों में मतभेद हुए और चार-पांच साल बाद ही विनोद भैय्या ने आज को त्याग दिया। उनका आज-त्याग भी उत्तर प्रदेश की हिन्दी पत्रकारिता की एक चर्चित घटना है।
पत्र प्रकाशन की कोई ऐसी विद्या नहीं जिसमें विनोद भैय्या निष्णात न हों। कैसी भी समस्या क्यों न हो चुटकियां बजाते ही समाधान उपस्थित। एक बार बनारस से आने वाला साप्ताहिक परिशिष्ट का फ्लांग बाक्स नहीं आया, ट्रेन में कहीं गुम हो गया था। समस्या यह कि बिना साप्ताहिक के रविवार का संस्करण कैसे प्रकाशित होगा। विनोद भैय्या ने हम लोगों को जुटाया, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान से चल सकने वाली सामग्री का चयन किया गया, उसी को चिपका कर, किसी तकनीक से प्लेट बनायी गयी और दूसरे दिन आज के पाठकों ने नये रूप में साप्ताहिक परिशिष्ट पढ़ा। जानने वाले जान गये थे कि कुछ गड़बड़ है लेकिन रविवार को उनको पढ़ने को साप्ताहिक परिशिष्ट तो मिल ही गया।
वह कमाल के संगठनकर्ता हैं और टीम को साथ लेकर चलने का उनमें नैसर्गिक गुण है। कई घटनाएं याद आती हैं, विस्तार भय से सबका उल्लेख नहीं करूंगा लेकिन वे सब घटनाए लोगों की भैय्या के साथ अटूट रूप से जोड़ती गयीं। उनके एक संकेत पर काम होता क्यों कि हर काम में उनकी उपस्थिति किसी न किसी रूप में जरूर रहती। वह काम में इतना खो जाते कि घर जाना, खाना- खाना भूल जाते, भाभी की नाराजगी झेलनी पड़ती लेकिन हंस कर टाल जाते है कहते- मेरा परिवार तो यही है, मैं परिवार में ही तो हूं। सचमुच वह पूरे परिवार का ख्याल रखते-खिलाते-पिलाते और काम लेते। किसी का चेहरा गिरा देखते तुरन्त पूछते क्या बात है सुस्त क्यों हो।
आज ज्वाइन करने के दो महीने बाद ही इमर्जेसी लग गयी। 25 जून 75 की शाम को दो पन्ने की टुकड़ी निकाली गयी और भैय्या के साथ ही सभी लोगों ने कानपुर में उसे बेचा। प्रचार का यह एक अच्छा मौका था। आपातकाल के दौरान अखबारों पर इतना अंकुश लग गया कि छापने लायक कुछ बचा ही नहीं पत्र की बिक्री कम होने लगी तो हिन्दी पत्रों में फीचर पृष्ठ देना शुरू किया, ताकि पाठकों को कुछ अतिरिक्त मिले पढ़ने के लिए। पहले हफ्ते में एक दिन, फिर दो दिन। आगे चलकर यह दैनिक फीचर पृष्ठ में बदल गये। विनोद भैय्या ने भी यह प्रयोग किया और सफलता मिली। जितनी बहुविध अध्ययन की प्रवृत्ति भैय्या की है, उतनी कम देखने को मिलती है, न्यूज सेंस तो उनका कमाल का है। आज पत्रकारों में पढ़ने की प्रवृत्ति, फीड बैक लेने की प्रवृत्ति नहीं है। अपनी बीट के अलावा कुछ नहीं जानना चाहते, अपना ही अखबार पूरा नहीं पढ़ते लोग। भैय्या इसके सख्त विरोधी हैं, खुद पढ़ते हैं, दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। हिन्दी अखबारों में न्यूज वीक और टाइम्स जैसी अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं से स्टोरी लिफ्ट करने की शुरूआत उन्होंने करायी। वह कहा करते हैं कि पाठकों की क्षुधा शांत करना ही पत्रकार का दायित्व है। प्राय: खुद ही रिपोर्टरों के साथ निकल जाते, नये-नये एंगिल बताते और रिपोर्ट फाइल करने पर पहले खुद पढ़ते।
एक घटना याद आती है। आपातकाल उठ गया था, चुनाव की घोषणा हो गयी थी, अखबारों ने दो साल की घुटन के बाद ताजी सांस लेना शुरू की थी और आपातकाल की ज्यादतियों की खबरों से वे पटे रहते थे। कानपुर का आज भी पीछे नहीं था। भैय्या ने हम लोगों को खुली छूट दे रखी थी लिखने की। प्रतिदिन दिल्ली के अखबारों से स्टोरी लिफ्ट की जाती। पाठक संख्या बढ़ रही थी। काम में खूब मजा। आता इसी बीच तत्कालीन सूचना मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने लखनऊ में सम्पादकों की बैठक बुलायी और  परोक्ष रूप से आपातकालीन खबरों के प्रकाशन पर आपत्ति जतायी- कहा कि हम दोस्त, दुश्मन की पहचान कर रहे हैं, चुनाव के बाद एक-एक को देखा जायेगा। लखनऊ से लौटने के बाद भैय्या ने हम लोगों की बैठक की और सब बातें बताकर राय जाननी चाही। सबने एक स्वर में कहा- आज तो छापने का मौका है, छापते हैं कल देखा जायेगा। सबकी राय जान भैय्या ने कहा-चलो खूब छापो या तो इस पार या उस पार!
विनोद भैय्या अखबार का बेहद सूक्ष्म अध्ययन करते हैं, छोटी से छोटी गलती की तरफ ध्यान जाता है और जिसने भी खबर लिखी है या जिसने शीर्षक लगाया है, उसे टोकने से चूकते नहीं। गुरू शिष्य परम्परा के अनुपम उदाहरण हैं भैय्या। यही कारण है कि जो लोग उनसे जुड़ते हैं, वे उनके ही हो जाते हैं। कई उदाहरण हैं जब विनोद भैय्या के एक संकेत पर दर्जनों लोगों ने एक अखबार छोड़ दूसरे को ज्वाइन कर लिया। यही कारण हैं कि वह अपनी टीम का बेहद ख्याल रखते हैं, सभी के योग क्षेम का उनको ध्यान रहता है। उनसे सीखे लोग आज कई जगहों पर शीर्ष पदों पर हैं, और वे यह स्वीकारते हैं कि उनके निर्माण में भैय्या का अनुपम योगदान है।
एक बार आज में हड़ताल हो गयी, प्रेस के लोग हड़ताल पर थे, विनोद भैय्या ने अपने प्रबन्धकीय कौशल से अखबार निकाला, हड़ताल सफल नहीं होने दी, न जाने क्यों मुझे आज में अस्थिरता के संकेत मिले। उन्हीं दिनों इलाहाबाद से अमृत प्रभात का प्रकाशन शुरू होने की चर्चा सुनी, आवेदन किया, साक्षात्कार के बाद नियुक्ति हो गयी। यह नवम्बर 77 का महीना था। भैय्या ने सुना, उन्होंने रोकने की कोशिश की। उन दिनों उपसम्पादकों को जो वार्षिक वेतन वृद्धि होती थी, मुझे उसका दोगुना दिया, लेकिन तब भी मुझे अमृत प्रभात से मिलने वाले वेतन से यहां की राशि कम थी। मैंने बताया तो उनका जवाब था- मैं तो तुम्हें अपने साथ रखना चाहता था, लेकिन पत्रिका बड़ा ग्रुप है, मैं उतना वेतन नहीं दे पाऊंगा, तुम जाओ लेकिन जब भी संकट पड़े मुझे याद करना। मैं इलाहाबाद चला गया। पत्रिका बहुत अच्छा संस्थान था, वहां का वेतन, सेवा-शर्ते, सुविधाएं, काम का माहौल इतना अच्छा था कि लोग केन्द्रीय सरकार की नौकरी छोड़कर वहां ज्वाइन करते। दिसम्बर 77 से 91 तक तो ठीक चला लेकिन फिर आर्थिक संकट आने लगा। प्रेस में अघोषित बंदी हो गयी। ऐसी स्थिति दो बार आयी। डेढ़-डेढ़ साल के लिए। मैं इलाहाबाद जाने के बाद भैय्या के सम्पर्क में नहीं रहा। लेकिन विनोद भैय्या ने मुझे हमेशा याद रखा। लखनऊ के मित्र बताते है कि विनोद भैय्या आपकी बेहद तारीफ करते हैं-बहुत चाहते हैं। मैने बचपना की- उनके सम्पर्क में नहीं रहा, लेकिन वह बड़े भाई की भूमिका से स्खलित नहीं हुए। दोनों बंदियों में उन्होंने लखनऊ आकर दैनिक जागरण ज्वाइन करने को कहा लेकिन इसी बीच पत्रिका खुल गयी और मै नहीं आ पाया। अमृत प्रभात पुन: शुरू हो जाने की सूचना उन्हें दी तो उन्होंने संतोष की सांस ली। अमृत-प्रभात जब बेहद आर्थिक संकट में चला गया तो मैने उसे छोड़ने का निर्णय लिया और अमर उजाला लखनऊ ब्यूरो ज्वाइन किया, लेकिन उसे भी एक साल बाद छोड़ना पड़ा। मैं भविष्य के बारे में कोई निर्णय ले पाता इसके पहले मेरे मित्र शिवशंकर गोस्वामी ने भैय्या का फोन मिला कर थमा दिया-लीजिए बात कर लीजिए, वह आपको बहुत चाहते हैं कोई न कोई रास्ता निकाल देंगे। मैं संकोच कर रहा था, बीस साल से भैय्या के सम्पर्क में नहीं था, एक साल लखनऊ में रहा तो भी उनसे नहीं मिला- किस मुंह से बात करूं। लेकिन जब वह लाइन पर आये-मैने प्रणाम कर परिचय दिया तो उनका पहला प्रश्न था कहां हो? क्या कर रहे हो? दफ्तर आओं वहीं विस्तार से बात होगी। दैनिक जागरण का दफ्तर पास ही था। थोड़ी देर में मैं पहुंचा। मैने अमर उजाला छोड़ने की जानकारी दी। उन्होंने कई बार कहा- परेशान मत हो मैं हूं! और एक मिनट रूक कर कहा- देहरादून चले जाओ, वहां समाचार सम्पादक की जगह खाली है, मेरे यह कहने पर कि बहुत दूर है, बच्चे छोटे हैं, इलाहाबाद में पढ़ रहे हैं, उन्होंने कहा कि-अच्छा सोचकर बताते हैं, बायोडाटा दे देना-एक हफ्ते बाद मिलना। मैं लखनऊ से इलाहाबाद चला आया और वहीं से बायोडाटा भेज-10 दिन बाद पुन: लखनऊ गया तो उनका निर्देश मिला-बरेली चले जाओ, वहां बच्चन सिंह थे, उन्होंने छोड़ दिया है, मैने वहां के जीएम से तुम्हारे लिए बात कर ली है। और मैं 28 मार्च 1999 को बरेली दैनिक जागरण चला आया।
यह घटना विनोद भैय्या के उस मानवीय स्वरूप का उदाहरण है जो लोगों में नहीं देखने को मिलता है। जागरण में आकर बराबर उनके सम्पर्क में रहने का सौभाग्य मिला और हर मुलाकात में कुछ न कुछ सीखने को। उनका प्रशिक्षण देने का तरीका प्राचीन गुरू-शिष्य परम्परा जैसा है, वह संस्थागत शिक्षा से प्रायोगिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण को बेहतर तरीका मानते हैं। उनका मानना है- पत्रकार कोई एक दिन में नहीं तैयार होता, उसे सतत प्रशिक्षण देने-पाने की जरूरत है। ..किसी को जबरिया पत्रकार नहीं बनाया जा सकता, जिसमें पत्रकारिता के कीड़े होते हैं, वही पत्रकार हो सकता हैं। यह कीड़ा है- संवेदनशीलता और जिज्ञासु प्रवृत्ति। वह पत्रकार की भूमिका शिक्षक के रूप में भी मानते हैं। कहते हैं हम समाज और देश के चौकीदार भी है, शिक्षक भी। गलत शब्दों के प्रयोग को वह अपराध मानते हैं। कहते हैं पत्रकारिता शब्दों का ही तो खेल है- शब्द ब्रह्म स्वरूप होते हैं, इनका ब्रह्म रूप में ही इस्तेमाल करो...। न भाव क्षरण हो न अर्थभ्रम। अच्छे पत्रकार बनना हो तो मस्तिष्क चैतन्य रखो, उसे पूरी खुराक दो, स्वस्थ रहो, अच्छा खाओ, अच्छा पढ़ो अच्छा सोचो, अच्छा लिखो।
सचमुच खाने का मजा तो भैय्या के साथ ही- वह भारतीय मनीषा के इस चिंतन से पूरी तरह सहमत थे कि अन्नमय कोश भरे रहने पर ही प्राणमय कोश और अन्त में ज्ञानमय कोश पुष्ट रहता है। अपने साथियों को खूब खिलाने, भरपेट खिलाने और स्वादिष्ट खिलाने की उनकी आदत थी। आप उनके निकट रहे लोगों से पूछिए-खाने पीने से जुड़े कितने ही संस्मरण सुनने को मिलेंगे।
खांटी बनारसी परिवेश में पले-बढ़े विनोद भैय्या आज भी पूरे बनारसी हैं, पान उनकी पसंद है, मस्ती उनके रोम रोम में है, साथियों में परम उन्मुक्त, न कुछ गोपन, न कुछ बनावटी, सब कुछ पारदर्शी, मस्ती के समय मस्ती काम के समय काम कभी-कभी बाल सुलभ निश्छलता-बाबा विश्वनाथ उन्हें स्वस्थ रखें, शतायु दें- यही कामना है।
(यह लेख मई 2007 में लिखा गया था)

रामधनी द्विवेदी
समाचार सम्पादक, दैनिक जागरण, बरेली

विश्‍व को जीवन देता है उत्‍तरायण सूर्य


अभी तीन दिन पहले हमने मकर संक्रांति मनाई, मकर संक्रांति को खिचड़ी कहते हैं हमारे पूरब में। खिचड़ी यानी सूर्य के उत्‍तरायण होने का दिन, गंगा स्‍नान का दिन, नए वस्‍त्र पहनने का दिन, दान का दिन, नए चावल,उडद,हरी मटर की खिचड़ी खाने का दिन, तिल के लड्डू खाने का दिन, रेवड़ी खाने का दिन और ठंड से धीरे-धीरे विदाई का दिन---आधे माघे कामर कांधे--- का दिन। और मांगलिक कार्य शुरू होने का दिन। तो इतना महत्‍वपूर्ण क्‍यों है यह दिन----

इस दिन हमारे आकाश में एक न‍क्षत्रीय घटना होती है। सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। इसके पहले तक वह लगभग एक महीने धनु राशि में रहता है। मकर राशि में सूर्य का प्रवेश ही मकर संक्रांति कही जाती है-- संक्रांति यानी संक्रमण-- संचार-- जाना- गमन। सूर्य हर महीने एक राशि मे रहता है। इस तरह वह बारह महीने में पूरे भचक्र--राशि मंडल -- की यात्रा कर लेता है और एक वर्ष की अवधि पूरी हो जाती है। यही हमारे सौर मास की गणना का आधार भी है। अर्थात वह हर महीने एक राशि से दूसरी राशि में  जाता है। यह राशि वास या राशि परिवर्तन कोई वास्‍तविक घटना नहीं होती। हम पृथ्‍वी के सापेक्ष ऐसा होते देखते हैं, इसलिए मान लेते हैं कि ऐसा हो रहा है। इससे हमारी ज्‍योतिषीय ओर अन्‍य गणनाएं होती हैं । किसी भी गणना के लिए किसी आधार - प्रस्‍थान विंदु की जरूरत होती है, वह सूर्य की इस गति( आभासी) से प्राप्‍त होती है। सूर्य उस तरह की गति नहीं करता जैसी हम उसे करते देखते हैं-- वास्‍तव में गति तो पृथ्‍वी कर रही है, हम उसपर स्थित हैं इसलिए उसके साथ हम भी अंतरिक्ष में चलते हैं तो अन्‍य पिंड भी चलते लगते हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे हम ट्रेन में बैठे आगे बढ़ंते हैं और अगल-बगल के पेड़, घर पीछे जाते लगते हैं। चलायमान हम हैं लगता है कि पेड़ और घर चल रहे हैं।  दुनिया को य‍ह बात हमारे मनीषियों ने ही सबसे पहले बताई थी।कुछ विषयांतर हो रहा है। मकर संक्रांति पर आते हैं--
तो जनवरी में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते है। भारतीय मनीषा ने इसकी कई तरह से व्‍याख्‍या की है। यह सूर्य का उत्‍तरायण होना है। आकाश में इस दिन से सूर्य पूर्व में थोड़ा उत्‍तर की ओर खिसकते से लगते हैं, दिन बड़े होने लगते हैं, ठंड धीरे- धीरे कम होने लगती है, जीवन में गति आने लगती है, प्रमाद खत्‍म होने लगता है, सर्वत्र जीवनी शक्ति का प्रभाव दिखाई देने लगता है। इसी से सूर्य के उत्‍तरायण होने को जीवनदाता, अमरत्‍वदाता कहा गया है--- एक सकारात्‍मक ऊर्जा का सर्वत्र प्रसार ही सूर्य के उत्‍तरायण होने का वास्‍तविक अर्थ हैं। वर्षा और शीत ऋतु में सूर्य मेघों से, कोहरे से ढंके रहते है। उनकी ऊर्जा का पूर्ण प्रवाह  पृथ्‍वी तक नहीं हो पाता । जीवन में सर्वत्र शैथिल्‍य दिखता है। उत्‍तरायण होते ही यह स्थिति दूर हो जाती है। हमें सूर्य उर्जा भरपूर मिलने लगती है। जीवन का संगीत चारों ओर सुनाई देने लगता है। संपूर्ण जीव-जगत, चर- अचर में प्राण संचरित हो उठता है।

इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई गई। परंपरागत रूप से अभी तक 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति होती थी। लेकिन पृथ्‍वी की गतियों के कारण---- धूर्णन गति (अपनी धुरी पर घूमना) और परिभ्रमण गति ( सूर्य के चारों ओर चक्‍कर लगाना) के कारण इस बार सूर्य विलंब से रात लगभग 12 बजे मकर राशि में प्रवेश किए। इसलिए मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ी। अब यह हर वर्ष 15 जनवरी को ही पड़ेगी।  एक दिन का यह अंतर लगभग 72 वर्ष बाद आता है। 72 वर्ष पहले मकर संक्रांति 13 जनवरी को पड़ती थी। किसी व्‍यक्‍ति के जीवन में यह घटना एक या दो बार ही देखने को मिलती है। यदि बचपन में उसने 14 जनवरी को मकर संक्राति मनाई है तो वृद्धावस्‍था में अगली तारीख को मनाएगा।
मुझे बचपन की खिचड़ी याद आती है। तब मैं चार या पांच वर्ष का था और पढ़ाई के लिए शहर (कानपुर) नहीं गया था। खिचड़ी के दिन नहाना सबसे महत्‍वपूर्ण घटना होती थी। चाहे नदियों में नहाया जाए या घर पर ही। बच्‍चों क्‍या, बड़ों के लिए भी यह साहस का काम माना जाता था। मेरे गांव मे एक विद्वान पंडित रहते थे। पद में वह मेरे भाई थे लेकिन उम्र में पिता की उम्र के थे। वह थे तो पंडित लेकिन नहाने से जी चुराते थे। आम दिनों मे एक गगरा पानी से ही नहा लेते थे। उनके बारे मे लोग मजाक में कहते कि सुद्धू  पंडित ( यह उनका गांव का नाम था)  साल में एक दिन खिचड़ी के दिन नहाते हैं।  वह इस कथन का खुद बहुत आनंद लेते और कहते कि खिचड़ी भी बहुत जल्‍दी- जल्‍दी हर साल आ जाती है, यार इस दिन तो नहाना ही पड़ता है।खैर--- तो खिचड़ी के दिन मां बड़े पतीले में पानी गर्म करतीं और सूरज निकलने पर धूप में रगड़-रगड़ कर नहलातीं। जिस साल बदली होती,उस साल कौड़ा जलता । गमछे से देह पोंछने के बाद नए कपड़े पहनने को मिलते, किसी साल नेकर-कमीज तो किसी साल सिर्फ नेकर- बनियाइन ही। जिसे कमीज मिलती वह कपड़े पहन कर सबको दिखाता घूमता। नए कपड़े पहन मां पहले से रखी खिचड़ी के सिद्घे को छूने को कहती जो बाद में पुरोहित या किसी ब्राह्मण को दान किया जाता। तो कपड़े पहन कर बड़ों के पैर छूने के बाद कुरुई ( मूंज का हाथ से बनाया गया गहरा प्‍लेट नुमा पात्र, जो आजकल एंटीक हो गया है और गांव में भी शायद ही देखने को मिलता है।) में लाई-चूरा, नया गुड़ या गट्टी और ढुंढा ( गुड़ और लाई या तिल को मिलाकर बना लड्डू) खाने  को मिलता। नहाने और नए कपड़े पहनने का उत्‍साह रहता। घूम-घूम कर दाना खाया जाता, फिर दही मिला गन्‍ने का रस पीने को मिलता, दही-चूड़ा भी। दोपहर को खिचड़ी मिलती--खूब घी डली। फूल की थाली में उस खिचड़ी का स्‍वाद ही अलग होता। अब ये सब बातें बस स्‍मृतियों में ही रह गई हैं। कितने अच्‍छे थे वे दिन--

(18 जनवरी 12011 को जागरण जंक्शन में प्रकाशित)

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Thursday, 28 July 2016

भाषा के प्रति आग्रह



बात 73-74 की है। तब मैं पत्रकारिता के पेशे में आया ही था। बनारस के दैनिक जनवार्ता में प्रशिक्षु के रूप में काम कर रहा था।जनवार्ता को तबके कई वरिष्‍ठ पत्रकारों को साथ लेकर चलने का श्रेय है। ये सभी उत्‍तर प्रदेश के दिग्‍गज पत्रकार थे। यह कहना सुखद लगता है कि बनारस उन दिनों हिंदी पत्रकारिता की नाभि  था। चारो ओर बनारस स्‍कूल की धाक थी। उन दिनों पत्रकारीय सुचिता शीर्ष पर थी जो आज दुर्लभ है। अखबारों पर इतना विश्‍वास रहता था कि अखबार पढ़े नहीं बांचे जाते थे,मतलब एक आदमी पढ़ रहा है चार सुन रहे हैं और लगे हाथों टिप्‍पणी भी कर रहे हैं। वाह गुरू का बात लिखी है। यदि कोई बात नहीं जंची तो बखिया उधेड़ने में भी संकोच नहीं। पत्रकारों का बड़ा सम्‍मान था, आप पत्रकार हैं मतलब कुछ विशिष्‍ट तो हैं ही। आम आदमी और अखबार इतने जुड़े थे कि बिना अखबार के बनारस की सुबह अधूरी मानी जाती थी। कहावत कही जाती थी- चना चबेना गंगजल और आज अखबार, काशी कबहु न छोडि़ए विश्‍वनाथ दरबार। आज जिस ब्रांडिंग और रीडर कनेक्‍ट के लिए लोग प्रयास करते हैं वह उन दिनों बिना प्रयास सिर्फ पेशे की ईमानदारी और विश्‍वसनीयता से प्राप्‍त थी। हिंदी (पत्रकारिता) को बनारस ने सैकड़ों शब्‍द दिये जो आज हिंदी की धरोहर हैं। उन दिनों यदि अखबार ने कोई नया शब्‍द लिखा तो पाठक उसका अर्थ पूछता और वह शब्‍द धीरे-धीरे प्रचलन में आ जाता। यदि कोई गलत शब्‍द प्रयोग हो जाता तो तत्‍काल उसपर आपत्ति आ जाती। एक बार कुछ औरते चोरी करते पकड़ी गयीं। अखबारों मे खबर छपी- तीन महिलाएं पर्स उड़ाते पकड़ी गयीं । दूसरे दिन से अखबारों में महिला शब्‍द के प्रयोग पर आपत्ति करते हुए सम्‍पादक के नाम पत्र आने लगे। उनमें यह कहा गया कि चोर औरतों को महिला क्‍यों लिखा गया। महिला शब्‍द की व्‍युत्‍पत्ति बताते हुए कहा गय‍ा कि महिला स़भ्रांत परिवार की स्त्रियों के लिए लिखा जाना चाहिए पर्स उड़ाने वाली चोरनियोंके लिए नहीं। उनके लिए औरतें, स्त्रियां कुछ भी लिखें महिला तो कतई नहीं। किस तरह की औरतों के लिए क्‍या लिखा जाय इसपर कई दिनों तक रोचक बौद्धिक बहस चली। भाषा के प्रति इस तरह का आग्रह अब कहां ?  अब तो हिंदी की सौत हिंगलिस पैदा हो गयी है। एक बार 74 में विधान सभा भंग कर अचानक चुनाव की घोषणा कर दी गयी। बहुगुणा जी तब कार्यवाहक मुख्‍यमंत्री थें। अंग्रेजी अखबारों ने इस चुनाव के लिए स्‍नैप इलेक्‍शन शब्‍द का इस्‍तेमाल किया। जनवार्ता मे विचार कर इसके लिए चट चुनाव शब्‍द का पहली बार इस्‍तेमाल किया, बाद में सभी अखबार यही लिखने लगे। प्रसंगत: यहां बहुगुणा जी के बारे दो शब्‍द जरूर कहना चाहूंगा। मैने उन दिनों उनकी कई चुनाव स्‍ाभाएं कवर की थीं। मुस्‍लिम समुदाय में उनका जो प्रभाव था वैसा कम लोगों का था। वह मुस्लिम क्षेत्र की चुनाव सभाओं में जिस हिंदी (उर्दू मिश्रित) में बोलते वही सचमुच में हिंदुस्‍तान की जुबान कही जा सकती है। किसी भी अन्‍य पार्टी में ऐसी भाषा बोलने वाले नेता कम थे।

मुझे याद आता है सारनाथ मे बौद्ध संगीति का आयोजन था। बर्मा(म्‍यामार) के प्रधान मंत्री ऊ नू उस कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में शामिल थे। पहले दिन जनवार्ता में आदरणीय प्रदीप जी ने सम्‍पादकीय लिखा। प्रवाह मे वह नाप से दो लाइन ज्‍यादा हो गया। प्रदीप जी मस्‍त मौला किस्‍म के पत्रकार थे लिखने के बाद बुलानाले पर बैठकबाजी करने चले गये थे( प्रदीप जी मेरे आदि गुरु रहे हैं,उनके जैसा प्रखर और तेजस्‍वी पत्रकार कम हैं।उनपर कभी अलग से--) उनका लिखा पढ़ने और  कम्‍पोज करने वाला बनारस मे एक ही व्‍यक्ति था। प्रदीप जी जहां जहां नौकरी करते वह वहां-वहां जाता।प्रदीप जी की लिखावट विचित्र थी,जैसे चींटी को स्‍याही में डुबो कर कागज पर छोडं दिया गया हो,‍लेकिन वह जिस स्‍पीड से लिखते वह कमाल की थी। मनो‍विज्ञानियों का कहना है जब व्‍यक्ति सोचता तेज है और उस स्‍पीड से लिख नहीं पाता तो उसकी लिखावट बिगड़ जाती है। प्रदीप जी के बारे मे यह बिल्‍कुल सच है। उनके लिखे एकाघ पत्र मेरे पास हैं और मेरा दावा है कि सभी लोग उसे पढ़ नहीं पाएंगे। जब फोरमैन ने सम्‍पादक श्री ईश्‍वर देव मिश्र जी को बताया कि सम्‍पादकीय दो लाइन बढ़ रहा है तो किसी की उसे काट कर कम करने की हिम्‍मत नहीं पड़ी और प्रदीप जी को उनके अड्डों पर ढ़ुढ़वाया गया जब वह नहीं मिले तो ईश्‍वरदेव जी ने उसे काट कर दो लाइन र्छोटा कर दिया। दूसरे दिन सुबह जब प्रदीप जी ने  वे शब्‍द नहीं देखे जो उन्होने भगवान बुद्ध के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्‍त किये थे तो उनका पारा चढ़ गया। दफ्तर पहुचकर उन्‍होने खूब हल्‍ला काटा। प्रदीप जी का कहना था रात भर बौद्ध साहित्‍य पढ़कर मैने यह सम्‍पादकीय लिखा था,उसमे बुद्ध के लिए ऐसे विशेषण प्रयोग किये गये थे जो बनारस के लिए सर्वथा नये होते।  उन्‍हें काटकर मेरे श्रम को नष्‍टकर दिया गया। अपने शब्‍दों के प्रति किसे अब इतना आग्रह। प्रदीप जी के आक्रोश का ईश्‍वरदेव जी ने कोई जवाब नहीं दिया सिर्फ हंसकर बोले -उनका नाराज होना वाजिब है,कई शब्‍द ऐसे थे जिनका अर्थ मुझे भी नहीं मालुम था। मैने उन्‍हें ही काटकर सम्‍पादकीय कम कर दिया।( ईश्‍वरदेवजी ने ये बात भोजपूरी में कही और ठठाकर हंसे थे। क्‍या सादगी थी। अपनी कमी को सार्व‍जनिक रूप से स्‍वीकार कर उसपर हंसने का साहस भी।ईश्‍वरदेव जी को प्रदीप जी ने लीडर(भारत) के दिनों में सिखाया था और उनके सीनियर थे। जनवार्ता मे ईश्‍वरदेव जी का पद और वेतन प्रदीप जी से ज्‍यादा था, लेकिन प्रदीप जी के प्रति उनका आदरभाव कम न था। उन्‍होने कभी अपने को उनसे वरिष्‍ठ नहीं समझा।

बनारस स्‍कूल में जहां नये शब्‍दों का सृजन किया जा रहा था, वहीं देशज शब्‍दों या अंग्रेजी के शब्‍दों के देशज उच्‍चारण को भी अंगीकार किया जा रहा था और इनका धड़ल्‍ले से अखबारों में इस्‍तेमाल भी किया जा रहा था। बैंक के लिए बंक,पैसेंजर के लिए पसिंजर,स्‍टेशन के लिए टेशन आदि ऐसे ही शब्‍द थे जो अखबारों में नि:संकोच लिख्‍ो जाते थे। यह सिर्फ इसलिए पाठक वही शब्‍द पढ़े जो वह बोलता है। अब ये शब्‍द अखबारों से खत्‍म हो गये हैं। इन शब्‍दों के इस्‍तेमाल के पीछे सम्‍पादकाचार्य बाबूराव विष्‍णु पराड़कर जी का यह तर्क था कि पाठक को यदि वही शब्‍द पढ़ने को मिलेगा जो वह रोजमर्रा की व्‍यवहार में बोलता है तो वह उस अखबार से अधिक जुड़ाव महसूस करेगा, जब वह अखबार का अभ्‍यस्‍त हो जाएगा तो हम शब्‍दों के तत्‍सम रूप का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। पराड़कर जी के इस तर्क से आज सहमत, असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन जब उन्‍होने यह प्रयोग किया तो इसे तब की जरूरत कहा जा सकता है जब प्रदेश और अन्‍य हिंदी भाषी क्षेत्रों में शिक्षाका प्रतिशत बहुत कम था और अखबार पढ़ने की आदत कम लोगों मे थी। हालांकि वह यह भी मानते थे कि अखबार समाचार देने के साथ ही भाषा का संस्‍कार और शिक्षा भी द‍ेते हैं।

जनवार्ता में अपने लगभग ढाई साल के कार्यकाल में मुझे आदरणीय त्रिलोचन शास्‍त्री जी का भी सानिघ्‍य मिला। उनकी मुझपर विशेष कृपा रहती रहती थी।(त्रिलोचन जी के बारे में पढ़ें आधारशिला का त्रिलोचन विशेषांक जिसका सम्‍पादन वाचस्‍पति जी ने किया है।) छहघंटों के समय में अधिकतर साहित्‍य चर्चा में ही बीतता। त्रिलोचन जी को सुनना अपने में अलग अनुभव था,इसका स्‍वाद वही जान सकता है जिसने उन्‍हें सुना हो। चर्चा चाहे जहां से शुरू हो किसी न किसी शब्‍द की व्‍युत्‍पति,उसकी व्‍याख्‍या,पर्याय,विलोम,समानार्थी शब्‍द सबकी बात हो जाती। शास्‍त्री जी चलते -फिरते विश्‍वकोष थे। वह गप्‍प भी इतनी गंभीरता से मारते कि सुनने वाला यकीन न करे तो क्‍या करे। वह शब्‍दों के सही उच्‍चारण पर विशेष जोर देते। पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के लोग श,स और ष के उच्‍चारण में प्राय: सतर्क नहीं होते। ष को ख कहना तो आम बात थी। शास्‍त्री जी इसकी शुद्धतापर विशेष जोर देते। यज्ञ को यज्‍य,संस्‍कार को सम्‍सकार,ज्ञान को ज्‍नान कहते। आर्यसमाजी और श़ुद्धतावादी आज भी ऐसा ही उच्‍चारण करते हैं । (ज्ञान मंडल प्रकाशन को ज्‍नान मंडल कहते। ज्ञान मंडल के बाहर आज भी अंग्रेजी में यही स्‍पेलिंग लिखी है। कभी- कभी लोग मजाक में इसे ज्‍नान मंडल न कहकर जनाना मंडल कह देते।) शब्‍द और भाषा के प्रति वैसा आग्रह और प्‍यास अब कहां।

(  4  मई 2010 को जागरण जंक्शन में प्रकाशित)